आज कल
इन बीते दिनों में जैसे मेरे भीतर की दुनिया ध्वस्त हो गई है। हर क्षण एक बोझिल सन्नाटा सा हो गया है। मैं वही हूं, पर मेरी आत्मा की आवाज कहीं खो गई है। मेरे भीतर की हलचल, मेरी बेचैनी अब शब्दों से परे हो चुकी है। मैं बोलना चाहता हूं, चीखना चाहता हूं, पर जैसे शब्दों ने भी मेरा साथ छोड़ दिया है। ये एक अजीब-सी खामोशी है । मुझे अब छोटी-छोटी चीज़ों से डर लगने लगा है। हर फोन की घंटी, हर अचानक आने वाली आवाज़ जैसे मेरे भीतर का संतुलन तोड़ देती है। लोगों से मिलने से कतराने लगा हूं। मैं किसी की सहानुभूति नहीं चाहता। मैं दया का पात्र नहीं बनना चाहता। पहले जो रिश्ते इतने सरल और स्वाभाविक लगते थे, अब वे बोझिल हो गए हैं। अब कोई मुझे वैसे नहीं देखता जैसे पहले देखा करते थे, और शायद इसीलिए मैं भी खुद को सबसे दूर रखने की कोशिश कर रहा हूं। कभी-कभी ऐसा लगता है कि अब इस जीवन में कहीं ठहराव नहीं है, सबकुछ बिखर चुका है। मन करता है कि दौड़ कर कहीं बहुत दूर चला जाऊं, जहां कोई मुझे न पहचान सके, जहां मैं खुद को भूल जाऊं। परंतु फिर सोचता हूं, आखिर कहां जाऊंगा? क्या उस अज्ञात गंतव्य पर भी मैं अपनी पीड़ा से भाग पाऊंगा?...