काश !

ये शरीर की ताप,
जैसे सूरज से आँखें मिला रहा है,
धमनियाँ अब फटने की लगातार कोशिश में हैं।
इस अंधेरे कमरे में,
मेरा मौन चीख रहा है,
एकदम असहाय होकर,
और मैं,
निर्भीकता का आवरण ओढ़े,
यमालय की राह देख रहा हूँ।

यह क्षण,
मेरे बुरे कर्मों को याद कर,
माफी माँगने का है।
परंतु मेरे भीतर का पश्चाताप,
एक अन्य आक्रोश से जूझ रहा है।
काश!
इस क्षण ,
तुम होते।

तुम्हारी आँखें,
जो मेरे अंधेरों में उजाले का दीप जलातीं।
तुम्हारी आवाज़,
जो मेरी चीखों को शांत करा देते ।
तुम्हारे स्पर्श,
जो इस शरीर की तपन को ठंडा कर देते।
अन्ततः 
तुम्हारी उपस्थिति,
मेरी आत्मा को मुक्ति दे पाती।
                    - जमशेद




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