सूखता वृक्ष


कभी-कभी लगता है कि वृक्ष की पहचान उसकी हरी-भरी पत्तियों से होती है। लेकिन जब पत्तियाँ ही मुरझाने लगें, तो वृक्ष का सूखना अनिवार्य हो जाता है।

बचपन में वृक्ष की छांव सबसे प्यारी लगती थी – वो ठंडक, जो हर धूप से बचा लेती थी। हर शाखा पर हरे पत्तों की सरसराहट, और हर कोने में एक नई ताज़गी का एहसास। पर समय के साथ जब पत्तियाँ मुरझाने लगती हैं, तो वो ताजगी भी धीरे-धीरे खत्म होने लगती है। 

सूखते वृक्ष की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वो तब भी खड़ा रहता है, जब भीतर से उसकी हरियाली मर चुकी होती है।

पहले वृक्ष की शाखाओं पर पत्तियों का घना आवरण था, और आज वही शाखाएँ सूनी पड़ी हैं। एक वक्त था जब सब उसकी छांव में बैठकर आराम करते थे, उसके फलों का आनंद लेते थे, और जीवन से जुड़े सवालों के जवाब खोजते थे। अब उसकी छांव में बस सूखे पत्तों की चुप्पी बची है। वृक्ष की शाखाएँ तो वहीं हैं, लेकिन उनमें हरियाली की जगह सूखा और वीरानी ने ले ली है।

वृक्ष के सूखने की प्रक्रिया भी बहुत धीमी होती है। कभी-कभी यह एक पत्ती से शुरू होती है, जो धीरे-धीरे पूरे वृक्ष को जकड़ लेती है। समय के साथ, पत्तियों का सूखापन इतना बढ़ जाता है कि फिर कोई उसे पुनः हराभरा करने की कोशिश भी नहीं करता।  
क्या वृक्ष सचमुच तब सूखता है जब उसकी पत्तियाँ झड़ती हैं, या तब जब उसकी जड़ें जीवन खोने लगती हैं?

जब पहली बार एहसास हुआ कि वृक्ष सूख रहा है, तो एक अजीब-सी उदासी छा गई। ऐसा लगा जैसे जीवन की ठंडक और शांति अब धीरे-धीरे मिट रही है। वो ताजगी, जो कभी इस वृक्ष के साथ जुड़ी थी, अब गायब हो गई है। 
शायद वृक्ष को उसकी शाखाओं और पत्तियों ने नहीं, बल्कि उसकी जड़ों ने जीवन दिया था, जो अब कमजोर हो रही हैं।

मैंने देखा है कि जब वृक्ष सूखता है, तो सिर्फ पत्तियाँ और टहनियाँ नहीं गिरतीं, बल्कि उसकी छांव के नीचे पले सपनों का भी अंत हो जाता है। वो सपने, जो किसी के जीवन का आधार थे, अब सूखे पत्तों की तरह बिखर गए हैं। शाखाओं के बीच की दूरी अब इतनी बढ़ चुकी है कि उन्हें फिर से जोड़ पाना असंभव लगता है। 

कभी लगता था कि वृक्ष की छांव वो स्थान है जहाँ हम हमेशा लौट सकते हैं। लेकिन अब जब वृक्ष सूखने लगा है, तो वहाँ लौटने का ख्याल भी सूनापन और दर्द देता है। अब वहाँ न छांव है, न ताजगी, न ठंडक। वृक्ष अब सिर्फ एक सूखा, निर्जीव ढांचा बनकर रह गया है।
शायद सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि वृक्ष सूखते हुए भी खड़ा रहता है, मानो उसे अब भी 'वृक्ष' कहा जा सके।

आज जब मैं इस सूखे वृक्ष के नीचे खड़ा होता हूँ, तो ऐसा लगता है जैसे उसके भीतर से जीवन गायब हो चुका है। उसकी शाखाएँ अब भी खड़ी हैं, पर उनमें हरियाली और जीवन की जगह वीरानगी ने ले ली है। वो वृक्ष अब उस पहचान को खो चुका है, जो कभी उसे विशेष बनाती थी।

वृक्ष तब सूखता है, जब उसकी जड़ें पोषण खो देती हैं और पत्तियों में जीवन समाप्त हो जाता है।

शायद वृक्ष को बचाने के लिए उसकी शाखाओं और पत्तियों की नहीं, बल्कि उसकी जड़ों की देखभाल जरूरी है। पर कभी-कभी जड़ें इतनी कमजोर हो जाती हैं कि फिर उन्हें पुनर्जीवित करना संभव नहीं होता। सूखते वृक्ष के साथ उसकी छांव, उसकी शीतलता और उसकी ताजगी भी सूख जाती है। 

और तब समझ आता है कि वृक्ष सिर्फ एक संरचना नहीं, बल्कि जीवन का प्रतीक था, जो अब सूख चुका है।

Comments

Anonymous said…
वृक्ष के माध्यम से मनुष्य के जीवन का शानदार चित्रण ✨👍🏼

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