पुरुषार्थ
संताप की पराकाष्ठा
अंत नहीं हो सकता
जीवन का ,
धर्म का ,
कर्म का,
मानवता का या
धैर्य का ;
यह सृजक भी नहीं हो सकता ,
संवेदनहीनता का ,
निर्ममता का ,
कुंठा का ,
व्यग्रता का या
विकलता का ,
ये तो केवल और केवल
विकल्प होता है ;
पुरुषार्थ की ओर बढ़ने का ।।
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