स्वीकृति

वितृष्णा से भरी
जिजीविषा
असंबद्ध होता जीवन
और
अवसान की ओर बढ़ता मैं
पराजय नहीं हो सकता है
स्वीकृति है
स्वयं की यथार्थ से ।
              -जमशेद

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