आज कल


इन बीते दिनों में जैसे मेरे भीतर की दुनिया ध्वस्त हो गई है। हर क्षण एक बोझिल सन्नाटा सा हो गया है। मैं वही हूं, पर मेरी आत्मा की आवाज कहीं खो गई है। मेरे भीतर की हलचल, मेरी बेचैनी अब शब्दों से परे हो चुकी है। मैं बोलना चाहता हूं, चीखना चाहता हूं, पर जैसे शब्दों ने भी मेरा साथ छोड़ दिया है। ये एक अजीब-सी खामोशी है ।

मुझे अब छोटी-छोटी चीज़ों से डर लगने लगा है। हर फोन की घंटी, हर अचानक आने वाली आवाज़ जैसे मेरे भीतर का संतुलन तोड़ देती है। लोगों से मिलने से कतराने लगा हूं। मैं किसी की सहानुभूति नहीं चाहता। मैं दया का पात्र नहीं बनना चाहता। पहले जो रिश्ते इतने सरल और स्वाभाविक लगते थे, अब वे बोझिल हो गए हैं। अब कोई मुझे वैसे नहीं देखता जैसे पहले देखा करते थे, और शायद इसीलिए मैं भी खुद को सबसे दूर रखने की कोशिश कर रहा हूं।

कभी-कभी ऐसा लगता है कि अब इस जीवन में कहीं ठहराव नहीं है, सबकुछ बिखर चुका है। मन करता है कि दौड़ कर कहीं बहुत दूर चला जाऊं, जहां कोई मुझे न पहचान सके, जहां मैं खुद को भूल जाऊं। परंतु फिर सोचता हूं, आखिर कहां जाऊंगा? क्या उस अज्ञात गंतव्य पर भी मैं अपनी पीड़ा से भाग पाऊंगा? शायद नहीं। हर जगह वही रिक्तता, वही अंधेरा मेरे साथ चलेगा।

मेरी आंखें अब मेरे मन की सबसे बड़ी साथी बन गई हैं। जब भी कोई आघात होता है, जब भी कोई बिन कहे दर्द उमड़ता है, तो ये चुपचाप बहने लगती हैं। हर आंसू में जैसे मेरा संपूर्ण दर्द घुला हुआ है। यह ऐसा अहसास है, जिसे शब्दों में बांधना कठिन है – मानो आंसुओं के सहारे ही मैं बचे हुए जीवन के टुकड़े जोड़ने की कोशिश कर रहा हूं। 

कभी-कभी लगता है, शायद यही आंसू दुनिया को बचाए हुए हैं। जो भी दुख मैं महसूस कर रहा हूं, वही कहीं और किसी के जीवन में भी हो रहा होगा। और शायद इन्हीं आंसुओं से किसी दिन आशा का सूरज उदय होगा। पर अभी, मैं उस अंधेरे में भटक रहा हूं, जहां न कोई राह है, न कोई मंजिल।
                                                          - जमशेद 

Comments

Anonymous said…
सोचने, समझने और लिखने की कला अविश्वसनीय है 🙏🏼
जमशेद said…
शुक्रिया 🌼
Anonymous said…
Ab aapko koi n koi manzil jarur milegi

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