इक्कीस के बाद के लड़के
हाँ ये उम्र वही होता है जब पिता जी के जूते अब सही-सही पैरों में आने लगते हैं और उसके साथ थोड़ी बहुत जिम्मेदारियां , जो ले आती है गंभीरता । दबाव इतना हो जाता है की मुस्कुराना भूल जाते हैं । ये समस्याओं को सुलझाने में खुद उसी में उलझने लगते हैं खैर उलझते हुए जानने लगते हैं जीवन को और शायद यहीं से अनुभवों का जन्म होता है ।
ये अपने कमरें की हर चीज बड़े सलीके से रखना चाहते हैं और वैसे ही सलीके की जीवन जहाँ सब कुछ सही हो , सब कुछ जैसे कि सारे दोस्त एकदम वैसे ही रहें जैसे नए-नए मिले थे या फिर किसी को कोई दुःख न हो सब खुश रहें , सब या फिर सब बराबर हों , सब अच्छे हो बहुत अच्छे । पर दरअसल वो भूल जाते हैं कि जीवन किसी दस बाई बारह के कमरों जैसा नहीं होता ।
वैसे तो ये दिखने में अब बहुत गंभीर या एकदम शांत हो गए रहते हैं पर दरअसल ऐसे नहीं होते हैं सच कहूँ तो ये भावनात्मक रूप से उतने ही कमजोर होते हैं जैसे किसी गुब्बारे में पानी भरा हो जो एक बहुत हल्की सी भरोसे के स्पर्श के साथ फुट जाना चाहता हो ।
इस उम्र में अब ख्वाब खुले आँख से देखने लगते हैं और ख्वाब को पूरा करने के लिए भूल जाते हैं रातों की नींद जहाँ अब उन्हें सिर्फ जाग के सबेरा नहीं करना होता बल्कि अपने मेहनत से सूरज भी उगाना चाहते हैं । इस कोशिश में इनकी अपेक्षाओं की छत कई बार ढह जाती है पर ये दोष अपनी असमर्थता को मानकर मुस्कुराते हुए बढ़ते ही रहते हैं बिना रुके, बिना थके ।।
- जमशेद
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