तुम्हारे बाद (२)

तुम्हारे बाद ,
बिना नाविक,
नदी में ,
तैरती नाव ,
और मेरा जीवन ;
दोनों एक जैसे हो गए हैं ।
हर दिन ,
आगे या पीछे की ,
अनिश्चितताओं के साथ ।
पर अब भय बिल्कुल नहीं हैं ,
नदी के मुहाने तक जाकर
समुद्र बन जाने की ;
या फिर कहीं ,
मंझधार में डूब जाने की ।
यही आभास है शायद  ,
निगति की ओर बढ़ जाने की ।।

Comments

Anonymous said…
बहुत खूब

Popular Posts