धब्बा

कप के नीचे लगा वो लाल निशान

जैसे लग रहा था धब्बा हो इस समाज पे 

या फिर वो रोक के बता रहा हो कि 

मैं उनमें से नहीं था !

 फिर गौर किया उनपे

 वो लोग भी मुझ जैसे ही दिख रहे थे

 हाँ उनके कपड़े साफ थे

 और मेरा मन !

 लौटते वक्त 

हँस पड़ा था इस खोखली मानसिकता पर

और झूठ पकड़ लिया था सारे किताबों की ।

                                -जमशेद

 





















Comments

Ved said…
उम्दा रचना
Anonymous said…
शानदार!आपकी रचना वर्तमान समाज की वास्तविकता को बखूबी उजागर करती है....
@π¥@ said…
बेहतरीन

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